बाइबल के अनुसार पाप क्या है?
बाइबल के अनुसार पाप की शुरुआत तब हुई जब आदम और हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करते हुए ज्ञान के पेड़ का फल खाया। इस पाप के कारण उन दोनों को परमेश्वर ने अदन बटिका से निकाल दिया, जिससे पाप और मृत्यु इस मनुष्य जीवन में आया।
इसका पुरा विवरण बाइबल के अध्याय
(उत्पत्ति 3:1-24) हैं।
पवित्र बाइबल में पाप का अर्थ हैं परमेश्वर के आदेशों और नियमों के विरुद्ध अपना जीवन को जीना,या परमेश्वर से बगावत करना,वह पाप हैं।
" जो कोई पाप करता है, वह व्यवस्था का विरोध करता है; ओर पाप तो व्यवस्था का विरोध है।" (1 यूहन्ना 3:4)
पाप जो हमारे कार्यों, हमारे शब्दों और विचारों के रूप में बाहरी रूप से प्रकट होता है, जैसे चोरी करना, हत्या करना, झूठ बोलना,अधर्म, विद्रोह, और नैतिक पतन
आदि।
" जो छल करता है वह मेरे घर के भीतर न रहने पाएगा; जो झूठ बोलता है वह मेरे साम्हने बना न रहेगा। "(भजन संहिता 101:7)
पाप केवल गलत कार्य नहीं, लेकिन एक आत्मिक स्थिति भी हैं जो मनुष्य को परमेश्वर से अलग कर देती है। जिसके कारण मनुष्य का जीवन में दुःख, चिन्ता, मनुष्य जीवन पतन हो जाता हैं।
आइए, हम पाप को बाइबल से पुरी तरह से समझने की कोशिश करते हैं ।
पवित्र बाइबल में पाप के प्रकार:-
बाइबल के अध्याय (गलातियों 5:19-21) में परमेश्वर ने कहा,
"19 शरीर के काम तो प्रगट हैं, अर्थात व्यभिचार, गन्दे काम, लुचपन।"
"20 मूर्ति पूजा, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, विरोध, फूट, विधर्म। "
"21 डाह, मतवालापन, लीलाक्रीड़ा, और इन के जैसे और और काम हैं, इन के विषय में मैं तुम को पहिले से कह देता हूं जैसा पहिले कह भी चुका हूं, कि ऐसे ऐसे काम करने वाले परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे। "
परमेश्वर के इन वचनों में पाप को मुख्य तीन प्रकार से वर्णन किया गया हैं :-
1.शारीरिक पाप
2.आत्मिक पाप
3.परमेश्वर का आज्ञा उल्लंघन पाप
1.शरीरिक पाप क्या है?
शारीरिक पाप :-वे पाप हैं जो मनुष्य अपनी शरीर की इच्छाओं और शरीर की वासनाओं के कारण होते हैं, जैसे - व्यभिचार करना, चोरी करना, नशा करना आदि।
✝️ व्यभिचार पाप : वे पाप हैं जो (विवाह के बाहर) पत्नी को छोड़ कर दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बनाना वह व्यभिचार हैं।
बाइबल के अध्याय में परमेश्वर के वचनों से समझेंगे
"तू व्यभिचार न करना"
(निर्गमन 20:14)
"परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्टि डाले वह अपने मन में उस से व्यभिचार कर चुका।"
(मत्ती 5:28 )
"व्यभिचार से बचे रहो: जितने और पाप मनुष्य करता है, वे देह के बाहर हैं, परन्तु व्यभिचार करने वाला अपनी ही देह के विरूद्ध पाप करता है।" (1 कुरिन्थियों 6:18)
परमेश्वर के इन वचनों से स्पष्ट होता हैं कि बाइबल में व्यभिचार को गंभीर पाप माना हैं। इसलिए मेरे परमेश्वर पर विश्वासी व्यभिचार जैसे पाप से दूर रहना चाहिए।
✝️ शारीरिक अशुद्धता पाप:- यह वह पाप हैं मनुष्य जब अपने शरीर और मन दोनों से गलत या गंदे काम करते हैं। जैसे, शरीर को गंदा रखना, नशा करना, बुरी सोच रखना या गलत व्यवहार करना।
"इसलिये अपने उन अंगो को मार डालो, जो पृथ्वी पर हैं, अर्थात व्यभिचार, अशुद्धता, दुष्कामना, बुरी लालसा और लोभ को जो मूर्ति पूजा के बराबर है।"
(कुलुस्सियों 3:5)
"और तुम भी, जब इन बुराइयों में जीवन बिताते थे, तो इन्हीं के अनुसार चलते थे। "
(कुलुस्सियों 3:7 )
"पर अब तुम भी इन सब को अर्थात क्रोध, रोष, बैरभाव, निन्दा, और मुंह से गालियां बकना ये सब बातें छोड़ दो।"
( कुलुस्सियों 3:8)
"एक दूसरे से झूठ मत बोलो क्योंकि तुम ने पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतार डाला है। "
(कुलुस्सियों 3:9 )
हमें अपने जीवन से पाप और बुराई, जैसे व्यभिचार, लोभ और बुरी इच्छाओं को समाप्त करना चाहिए, क्योंकि ये परमेश्वर के खिलाफ हैं। पहले हम इन बुराइयों में जीते थे, लेकिन अब हमें इन्हें छोड़कर नया और पवित्र जीवन जीना चाहिए। हमें क्रोध, बैर, निन्दा और गालियाँ भी छोड़नी चाहिए।
✝️ शराब और नशा पाप: -अधिक शराब पीना या नशीली चीज़ों का सेवन करना।
शराब और नशा के बारे में बाइबल वचन
"मदिरापानियों का स्वर्ग के राज्य में हिस्सा नहीं होगा।" (1 कुरिन्थियों 6:10)
" दाखमधु ठट्ठा करने वाला और मदिरा हल्ला मचाने वाली है; जो कोई उसके कारण चूक करता है, वह बुद्धिमान नहीं।
"(नीतिवचन 20:1)
" और दाखरस से मतवाले न बनो, क्योंकि इस से लुचपन होता है, पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ। "(इफिसियों 5:18)
परमेश्वर के इन वचनों से स्पष्ट हैं कि हमें मदिरा और नशे से दूर रहना चाहिए और आत्मा से परिपूरित होना चाहिए।
✝️ भोजन और भोग की लत पाप : -आवश्यकता से अधिक भोजन या सांसारिक सुखों में लिप्त होना ।
भोजन और भोग की लत के बारे में बाइबल में लिखा है
" उन का अन्त विनाश है, उन का ईश्वर पेट है, वे अपनी लज्ज़ा की बातों पर घमण्ड करते हैं, और पृथ्वी की वस्तुओं पर मन लगाए रहते हैं। "(फिलिप्पियों 3:19)
"दाखमधु के पीने वालों में न होना, न मांस के अधिक खाने वालों की संगति करना ।"
(नीतिवचन 23:20 )
"क्योंकि पियक्कड़ और खाऊ अपना भाग खोते हैं, और पीनक वाले को चिथड़े पहिनने पड़ते हैं।"( नीतिवचन 23:21)
परमेश्वर के इन वचनों से स्पष्ट होता हैं कि हम अपने पर हमेशा संयम और संतुलन बनाए रखना है। भोजन और सांसारिक सुखों का आनंद लेना गलत नहीं है, लेकिन जब यह लत बन जाए और आवश्यकता से अधिक हो जाए, तो यह आत्मिक जीवन और शारीरिक हानि का कारण बन जाता है। इसलिए हमें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए और ईश्वर की इच्छा को प्राथमिकता देनी है।
2 .आत्मिक पाप: ये वे पाप हैं जो आत्मा और हृदय के अंदर होते हैं, जैसे - घमंड, ईर्ष्या, क्रोध, और ईश्वर के प्रति अविश्वास।
✝️ घमंड करना और खुद पर अभिमान करना पाप :- आत्म-संतुष्टि और स्वयं को दूसरों से ऊंचा मानना।
"विनाश से पहिले गर्व, और ठोकर खाने से पहिले घमण्ड होता है। "(नीतिवचन 16:18)
" जब अभिमान होता, तब अपमान भी होता है, परन्तु नम्र लोगों में बुद्धि होती है।" (नीतिवचन 11:2)
"वह तो और भी अनुग्रह देता है; इस कारण यह लिखा है, कि परमेश्वर अभिमानियों से विरोध करता है, पर दीनों पर अनुग्रह करता है।"( याकूब 4:6 )
"जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा: और जो कोई अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा।"(मत्ती 23:12 )
"हे नवयुवकों, तुम भी प्राचीनों के आधीन रहो, वरन तुम सब के सब एक दूसरे की सेवा के लिये दीनता से कमर बान्धे रहो, क्योंकि परमेश्वर अभिमानियों का साम्हना करता है, परन्तु दीनों पर अनुग्रह करता है। "(1 पतरस 5:5)
परमेश्वर के इन वचनों से स्पष्ट हैं कि हम अपने जीवन में घमंड करना और खुद पर अभिमान करना छोड़कर नम्रता और दीनता का जीवन जीना है।
✝️ ईर्ष्या, जलन ,क्रोध और द्वेष पाप :- दूसरों की सफलता, धन, या सुख देखकर उनके प्रति जलन ,असंतोष किसी के प्रति गुस्सा या नफरत रखना।
"सब प्रकार की कड़वाहट और प्रकोप और क्रोध, और कलह, और निन्दा सब बैरभाव समेत तुम से दूर की जाए।"
( इफिसियों 4:31 )
"पर अब तुम भी इन सब को अर्थात क्रोध, रोष, बैरभाव, निन्दा, और मुंह से गालियां बकना ये सब बातें छोड़ दो। "
(कुलुस्सियों 3:8)
"कोमल उत्तर सुनने से जलजलाहट ठण्डी होती है, परन्तु कटुवचन से क्रोध धधक उठता है। "
(नीतिवचन 15:1 )
" हे मेरे प्रिय भाइयो, यह बात तुम जानते हो: इसलिये हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्पर और बोलने में धीरा और क्रोध में धीमा हो। "
" क्योंकि मनुष्य का क्रोध परमेश्वर के धर्म का निर्वाह नहीं कर सकता है। "
(याकूब 1:19-20)
परमेश्वर के इन वचनों से स्पष्ट होता हैं कि ईर्ष्या, जलन, क्रोध और द्वेष मनुष्य को परमेश्वर के धर्म से दूर ले जाते हैं और समाज में कड़वाहट फैलाते हैं। इसलिए हमें इन नकारात्मक भावनाओं से बचकर, शांति, संयम, और प्यार से जीना चाहिए। हमें अपने विचारों और शब्दों में विनम्रता और संयम बनाए रखना चाहिए ताकि हम न केवल परमेश्वर के मार्ग पर चलें, बल्कि दूसरों के साथ भी अच्छे संबंध बना सकें।
✝️ झूठ (सत्य) और धोखा (छल) पाप:-
"तू किसी के विरुद्ध झूठी साक्षी न देना।"
(निर्गमन 20:16)
"अपनी जीभ को बुराई से रोक रख, और अपने मुंह की चौकसी कर कि उससे छल की बात न निकले। "
(भजन संहिता 34:13)
" एक दूसरे से झूठ मत बोलो क्योंकि तुम ने पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतार डाला है। "
(कुलुस्सियों 3:9)
" पर डरपोकों, और अविश्वासियों, और घिनौनों, और हत्यारों, और व्यभिचारियों, और टोन्हों, और मूर्तिपूजकों, और सब झूठों का भाग उस झील में मिलेगा, जो आग और गन्धक से जलती रहती है: यह दूसरी मृत्यु है। "
(प्रकाशित वाक्य 21:8)
" झूठों से यहोवा को घृणा आती है परन्तु जो विश्वास से काम करते हैं, उन से वह प्रसन्न होता है। "
(नीतिवचन 12:22)
"मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?" (यिर्मयाह 17:9)
"क्योंकि ऐसे लोग झूठे प्रेरित, और छल से काम करने वाले, और मसीह के प्रेरितों का रूप धरने वाले हैं। "
"और यह कुछ अचम्भे की बात नहीं क्योंकि शैतान आप भी ज्योतिमर्य स्वर्गदूत का रूप धारण करता है। "(2 कुरिन्थियों 11:13 -14)
"इस कारण झूठ बोलना छोड़कर हर एक अपने पड़ोसी से सच बोले, क्योंकि हम आपस में एक दूसरे के अंग हैं। "
(इफिसियों 4:25 )
"जो छल करता है वह मेरे घर के भीतर न रहने पाएगा; जो झूठ बोलता है वह मेरे साम्हने बना न रहेगा।"
(भजन संहिता 101:7 )
" झूठा साक्षी निर्दोष नहीं ठहरता, और जो झूठ बोला करता है, वह नाश होता है। "
(नीतिवचन 19:9 )
परमेश्वर के इन वचनों से स्पष्ट होता है कि झूठ (सत्य)और धोखे (छल)को पाप माना हैं। बाइबल में परमेश्वर का वचन सिखाती हैं कि परमेश्वर सत्य और ईमानदारी से प्रेम करता हैं । इसलिए हमें झूठ और छल करने से दूर रहना चाहिए।
✝️ अविश्वास पाप: -अविश्वास का मतलब है परमेश्वर पर भरोसा न करना या परमेश्वर पर संदेह करना।
अविश्वास के बारे में बाइबल वचन
"और विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है, क्योंकि परमेश्वर के पास आने वाले को विश्वास करना चाहिए, कि वह है; और अपने खोजने वालों को प्रतिफल देता है। "
(इब्रानियों 11:6)
"यीशु ने उन को उत्तर दिया, कि मैं तुम से सच कहता हूं; यदि तुम विश्वास रखो, और सन्देह न करो; तो न केवल यह करोगे, जो इस अंजीर के पेड़ से किया गया है; परन्तु यदि इस पहाड़ से भी कहोगे, कि उखड़ जो; और समुद्र में जा पड़, तो यह हो जाएगा। "
(मत्ती 21:21)
"यीशु ने उस से कहा; यदि तू कर सकता है; यह क्या बता है विश्वास करने वाले के लिये सब कुछ हो सकता है। "
"बालक के पिता ने तुरन्त गिड़िगड़ाकर कहा; हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूं, मेरे अविश्वास का उपाय कर। "
(मरकुस 9:23 -24)
"पर विश्वास से मांगे, और कुछ सन्देह न करे; क्योंकि सन्देह करने वाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है। "
(याकूब 1:6)
"और उस ने वहां उन के अविश्वास के कारण बहुत सामर्थ के काम नहीं किए। "(मत्ती 13:58)
इन वचनों से स्पष्ट होता हैं कि परमेश्वर पर भरोसा न करना या उस पर संदेह करके हम परमेश्वर के विरुद्ध पाप करते हैं। बाइबल हमें सिखाती है कि विश्वास ही वह चाबी है जो परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं और आशीषों को खोलती है। हम अविश्वास के बजाय, हमें विश्वास के साथ परमेश्वर के पास आना चाहिए और उसकी सामर्थ्य पर भरोसा रखना चाहिए।
✝️ अनवस्था पाप :-अनवस्था का अर्थ है अस्त-व्यस्तता, असंतुलन, या अस्थिरता।
अनवस्था के बारे में बाइबल वचन
" क्योंकि परमेश्वर गड़बड़ी का नहीं, परन्तु शान्ति का कर्त्ता है; जैसा पवित्र लोगों की सब कलीसियाओं में है।"
(1 कुरिन्थियों 14:33)
"इसलिये कि जहां डाह और विरोध होता है, वहां बखेड़ा और हर प्रकार का दुष्कर्म भी होता है। "
(याकूब 3:16)
"जिसकी आत्मा वश में नहीं वह ऐसे नगर के समान है जिसकी शहरपनाह नाका कर के तोड़ दी गई हो।"
(नीतिवचन 25:28 )
"हर एक व्यक्ति प्रधान अधिकारियों के आधीन रहे; क्योंकि कोई अधिकार ऐसा नहीं, जो परमेश्वर की ओर स न हो; और जो अधिकार हैं, वे परमेश्वर के ठहराए हुए हैं। "
"इस से जो कोई अधिकार का विरोध करता है, वह परमेश्वर की विधि का साम्हना करता है, और साम्हना करने वाले दण्ड पाएंगे। "(रोमियो 13:1-2 )
"क्योंकि बहुत से लोग निरंकुश बकवादी और धोखा देने वाले हैं; विशेष करके खतना वालों में से।"
(तीतुस 1:10)
परमेश्वर के इन वचनों से स्पष्ट होता है कि
अनवस्था या अव्यवस्था का मूल कारण हमेशा मनुष्य के हृदय में छिपी हुई बुरी इच्छाएं, ईर्ष्या, स्वार्थ और आत्म-नियंत्रण की कमी होती है। परमेश्वर चाहता है कि हम शांति और व्यवस्था में रहें, और उसके द्वारा स्थापित अधिकारों का आदर करें। अव्यवस्था से बचने के लिए हमें आत्म-नियंत्रण, विवेक और परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण की आवश्यकता है।
3.आज्ञा उल्लंघन: ये पाप तब होते हैं जब कोई व्यक्ति ईश्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन करता है, जैसे - झूठ बोलना, मूर्ति पूजा करना, या परमेश्वर के आदेशों को न मानना।
✝️ मूर्ति पूजा करना:- किसी भी देवी-देवताओं की मूर्तियों को बनाकर उसकी पूजा करना।
मूर्ति पूजा के बारे में बाइबल वचन
"तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना।"
"तू अपने लिये कोई मूर्ति खोदकर न बनाना, न किसी कि प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, वा पृथ्वी पर, वा पृथ्वी के जल में है। "
"तू उन को दण्डवत न करना, और न उनकी उपासना करना; क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा जलन रखने वाला ईश्वर हूं, और जो मुझ से बैर रखते है, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दण्ड दिया करता हूं, "
(निर्गमन 20:3-5)
" कि शापित हो वह मनुष्य जो कोई मूर्ति कारीगर से खुदवाकर वा ढलवाकर निराले स्थान में स्थापन करे, क्योंकि इस से यहोवा को घृणा लगती है। तब सब लोग कहें, आमीन।"
(व्यवस्थाविवरण 27:15)
" इस कारण, हे मेरे प्यारों मूर्ति पूजा से बचे रहो । "
(1 कुरिन्थियों 10:14)
"उन लोगों की मूरतें सोने चान्दी ही की तो हैं, वे मनुष्यों के हाथ की बनाईं हुई हैं। "
"उनका मुंह तो रहता है परन्तु वे बोल नहीं सकती; उनके आंखें तो रहती हैं परन्तु वे देख नहीं सकतीं। "
(भजन संहिता 115:4 -5)
" मैं यहोवा हूं, मेरा नाम यही है; अपनी महिमा मैं दूसरे को न दूंगा और जो स्तुति मेरे योग्य है वह खुदी हुई मूरतों को न दूंगा। "(यशायाह 42:8)
इन बाइबल के वचनों से स्पष्ट होता है कि परमेश्वर एक है और उसके अलावा किसी अन्य की पूजा नहीं करनी चाहिए। इसमें मूर्तियों को बनाने, उनकी पूजा करने या उन्हें परमेश्वर का स्थान देने से मना किया गया है। बाइबल के अनुसार, ईश्वर निराकार और अदृश्य है, और उसकी उपासना बिना किसी मूर्ति के की जानी चाहिए।
✝️ झूठ बोलना पाप:-
झूठ बोलने के बारे में बाइबल वचन
"तू किसी के विरुद्ध झूठी साक्षी न देना।"
(निर्गमन 20:16)
"झूठों से यहोवा को घृणा आती है परन्तु जो विश्वास से काम करते हैं, उन से वह प्रसन्न होता है।"
(नीतिवचन 12:22)
" एक दूसरे से झूठ मत बोलो क्योंकि तुम ने पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतार डाला है। "
(कुलुस्सियों 3:9)
"जो छल करता है वह मेरे घर के भीतर न रहने पाएगा; जो झूठ बोलता है वह मेरे साम्हने बना न रहेगा।"
(भजन संहिता 101:7)
"जो सच बोलता है, वह धर्म प्रगट करता है, परन्तु जो झूठी साक्षी देता, वह छल प्रगट करता है।" (नीतिवचन 12:17)
✝️ परमेश्वर के आदेशों को न मानना पाप:-
आदेशों को न मानने के बाइबल वचन
"परन्तु यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की बात न सुने, और उसकी सारी आज्ञाओं और विधियों के पालने में जो मैं आज सुनाता हूं चौकसी नहीं करेगा, तो ये सब शाप तुझ पर आ पड़ेंगे। "(व्यवस्थाविवरण 28:15)
"देख बलवा करना और भावी कहने वालों से पूछना एक ही समान पाप है, और हठ करना मूरतों और गृहदेवताओं की पूजा के तुल्य है। तू ने जो यहोवा की बात को तुच्छ जाना, इसलिये उसने तुझे राजा होने के लिये तुच्छ जाना है। "
(1 शमूएल 15:23)
"यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।"( यूहन्ना 14:15)
" इसलिये जो कोई भलाई करना जानता है और नहीं करता, उसके लिये यह पाप है।" (याकूब 4:17)
"जो शिक्षा पर चलता वह जीवन के मार्ग पर है, परन्तु जो डांट से मुंह मोड़ता, वह भटकता है।" (नीतिवचन 10:17 )
बाइबल के इन वचनों से स्पष्ट होता है कि परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन न करना पाप हैं।
इसलिए हमें परमेश्वर के आज्ञाओं का पालन करना उसके प्रति प्रेम, आज्ञाकारिता और समर्पण का प्रतीक है। उसके निर्देशों को न मानने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जैसे श्राप, भटकाव और परमेश्वर से दूरी। इसलिए, परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन जीना और उसकी आज्ञाओं का पालन करना आवश्यक हैं।
बाइबल के इन वचनों से हमने जाना पाप क्या है? हम अपने आप को जांचना चाहिए कि क्या हम इस प्रकार के पाप में अपने जीवन जी रहे हैं? और जी भी रहे हैं तो आज ही पाप से छुटकारा के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करें। और
बाइबल के वचन अनुसार सच्चे हृदय से पश्चाताप से,प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने से,परमेश्वर से प्रार्थना करके क्षमा मांगने से और दुसरे को क्षमा करके हम अपने पापों की क्षमा मांग सकते हैं।
पवित्र बाइबल में पापों की क्षमा वचन
✝️ पश्चाताप:-
" यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है।"
(1 यूहन्ना 1:9)
✝️ परमेश्वर से प्रार्थना करके क्षमा मांगने से :-
"हे परमेश्वर, अपनी करूणा के अनुसार मुझ पर अनुग्रह कर; अपनी बड़ी दया के अनुसार मेरे अपराधों को मिटा दे।"
( भजन संहिता 51:1)
✝️ दुसरे को क्षमा करके:-
"इसलिये यदि तुम मनुष्य के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा। "(मत्ती 6:14)
✝️ प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने से:-
"क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। "
(यूहन्ना 3:16 )
"परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।" (रोमियो 5:8 )
" जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, वह इस से प्रगट हुआ, कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को जगत में भेजा है, कि हम उसके द्वारा जीवन पाएं।" (1 यूहन्ना 4:9)
" प्रेम इस में नहीं कि हम ने परमेश्वर ने प्रेम किया; पर इस में है, कि उस ने हम से प्रेम किया; और हमारे पापों के प्रायश्चित्त के लिये अपने पुत्र को भेजा। "(1 यूहन्ना 4:10)
"परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। "(यूहन्ना 1:12 )
"यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता।"
(यूहन्ना 14:6)
इस वचन में यीशु यह स्पष्ट कहते हैं कि वही एकमात्र मार्ग हैं जो परमेश्वर (पिता) तक पहुंचने का मार्ग है।
" जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका; इसलिये कि उस ने परमेश्वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्वास नहीं किया।"
(यूहन्ना 3:18)
पवित्र बाइबल में पाप से क्षमा जो परमेश्वर की कृपा और प्रभु यीशु मसीह के क्रूस पर बलिदान , यीशु ने हमारे पापों के लिए अपने लहू को बहया ।
जो कोई प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करता हैं और उनके वचनों , शिक्षाओं को ग्रहण करता है उसके पाप क्षमा हो जाते हैं। आमीन।।
मैं हरिकृष्णा मसीह के साथ परमेश्वर का वचन पड़ने और समझने के लिए धन्यवाद!!
परमेश्वर के वचनों को share करें ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को तक पहुंचे और नश होने से बचाया जा सके।

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